पतंग चंचल शोख रंग बिरंगी और सबसे ज्यादा रहस्यमय चीज जो इसकी मेरा मन मोह लेती थी हाय डोर पर चढ़ के दूर सदूर गगन में उड़ना,पर न कभी उड़ा पाया एक आध बार कोशिश की पर पापा ने पंतग से ज्यादा मुझे उड़ा दिया ,तो हुआ कुछ यू की हिम्मत की कमी के चलते अपन तो बिन पतंग उड़ाये ही रह गए
पापा को हमेशा डर रहता था कि पतंग उड़ाते उड़ाते मैं कहीं छत से टपक न पड़ू पके आम की तरह पर बचपन कुछ इस तरह से डर में गुजरा एक तो मार का डर पतंग का प्यार, कुछ रीना झीना सा अधूरा अधूरा सा.......
पापा को हमेशा डर रहता था कि पतंग उड़ाते उड़ाते मैं कहीं छत से टपक न पड़ू पके आम की तरह पर बचपन कुछ इस तरह से डर में गुजरा एक तो मार का डर पतंग का प्यार, कुछ रीना झीना सा अधूरा अधूरा सा.......
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